Saturday, October 30, 2021

Interesting Facts About Burj Khalifa । बुर्ज खलीफा के बारे में कुछ रोचक तथ्य।

October 30, 2021 0 Comments

Interesting Facts About Burj Khalifa

बुर्ज खलीफा के बारे में कुछ रोचक तथ्य।


Dubai में बनायी गयी burj khalifa इस दुनिया में इंसान द्वारा बनाई गयी सबसे ऊँची इमारत है। ये इमारत Engineering के इतिहास की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है। इस इमारत को बनाने के लिए बहुत ही हिम्मत और साहस की जरूरत थी आप लोग सोच सकते है कि इतनी ऊँचाई पर Engineers और मजदूरों ने कैसे काम किया होगा?
तो चलिए आज Burj Khalifa के बारे में कुछ रोचक तथ्य जान लेते हैं जो शायद आपको नहीं पता हो।

बुर्ज खलीफा के बारे में कुछ रोचक तथ्य।


1. दुनिया की सबसे ऊँची ईमारत बुर्ज खलीफा (Burj Khalifa) जो कि दुबई (Dubai) में स्थित है इस इमारत की height 828 मीटर (2,716.5 फ़ीट) है जो की आइफिल टावर (Eiffel tower) की तुलना से करीब तीन गुणा अधिक है |


2 . एक अनुमान के अनुसार बुर्ज खलीफा को बनाने में लगभग $1.5 billion खर्च हुआ है।


3 . बुर्ज खलीफा में कुल 163 मंजिल है जिसमे 58 लिफ्ट (lifts) है और 2957 पार्किंग स्पेस (parking space), 304 होटल (hotels) 37 ऑफिस फ्लोर (Office floor) और 900 apartments है।


4 . क्या आप जानते है बुर्ज खलीफा को पहले बुर्ज दुबई कहा जाता था| बाद में यहाँ के राष्ट्रपति खलीफा बिन ज़ायेद अल नह्यान (Khalifa bin Zayed Al Nahyan)के सम्मान में इसका नाम बुर्ज खलीफा रख दिया गया।


5 . बुर्ज खलीफा के मालिक ईमार ने इसका प्रस्ताव 2003 में रखा था जिसका काम 2004 में शुरू कर दिया गया था! 2010 में ये इमारत बन के तैयार हो गयी थी और इसे लोगों के लिए शुरु कर दिया गया था।


6 . बुर्ज खलीफा के बनने के समय करीबन 12,000 मजदूर दिन-रात काम करते थे जो कि अलग अलग देशो और अलग अलग जगहों से आये थे! ये लोग इतनी ऊँची इमारत पर बिना घबराए काम करते थे।


7 . इस इमारत को बनाने में 100,000 हाथियों के बराबर कंक्रीट और पांच A380 हवाई जहाज के बराबर एल्युमीनियम (aluminium) का प्रयोग हुआ है।


8 . बुर्ज खलीफा में एक समय में लगभग 35,000 लोगो के रहने की व्यवस्था है।


9 . बुर्ज खलीफा (Burj Khalifa) की Building इतनी ऊँची है की आप इसे 95 किलोमीटर दूर से भी देख सकते है! यहाँ तक की इसकी चोटी से पडोसी देश ईरान(Iran) को भी देखा जा सकता है।



10 . बुर्ज खलीफा में जमीन से लगभग 210 मीटर की ऊँचाई पर 25 मीटर की चौड़ाई का हेलिपैड भी बनाया गया है जिस पर हेलीकाप्टर उतारा जाता है।


11 . हर दिन इस विशाल इमारत में लगभग 946,000 लीटर पानी को 100 किलोमीटर पाइप की सहायता से पहुंचाया जाता है।


12 . बुर्ज खलीफा की 76वी मंजिल पर सबसे ऊँचा स्विमिंग पूल है और 122वी मंजिल पर रेस्टॉरेंट भी है।


13 . बुर्ज खलीफा के नाम 6 world records है जिसमे सबसे ऊँची building, सबसे ऊँची लिफ्ट और सबसे ज्यादा मंजिल आदि शामिल है।


14 . बुर्ज खलीफा की इमारत इतनी ऊँची है की इसके 80 मंजिल के ऊपर रहने वालो को रमजान के दिनों में ज्यादा देर भूखा रहना पड़ता है क्योंकि ऊपर सूरज ज्यादा देर तक दिखता है।


15 . क्या आप जानते है बुर्ज खलीफा  में लगे AC से एक वर्ष में जितना पानी निकलता है उससे ओलम्पिक के पांच स्विमिंग पूल (swimming pool) भरे जा सकते है।


16 . बुर्ज खलीफा (Burj Khalifa) चारो तरफ से कृतिम झील से घिरा हुआ है जो इसकी खूबसूरती को चार – चाँद लगा देता है।


17. दुबई में बहुत तेज़ हवाए चलती है जो ऊँची इमारतो को नुक्सान पहुंचा सकती है तो इस इमारत में सुरक्षा के बहुत अच्छे प्रबंध किये गये है जैसे हवा के दवाव को झेलने के लिए सयंत्र, जब हवा का दवाव बढ़ जाए उसके लिए अलार्म सिस्टम (alarm system) आदि।


कुछ और Interesting Fact About Burj Khalifa


1#. दुनिया की सबसे बड़ी इमारत बुर्ज खलीफा को बनाने के लिए 12000 मजदूरों ने दिन रात काम करके इस प्रोजेक्ट को तैयार करा था ।


2#. बुर्ज खलीफा को बनाने के लिए 6 वर्ष का समय और 8 अरब डॉलर की लागत लगी थी।


3#. बुर्ज खलीफा इमारत की ऊंचाई 824 मीटर ऊंची और 164 मंजिला दुनिया की सबसे ऊंची इमारत है।


4#. बुर्ज खलीफा को बनने में 6 वर्ष का समय लगा और उसके बाद 4 जनवरी 2009 को इस का भव्य उद्घाटन समारोह के साथ किया गया।


5#. बुर्ज खलीफा के 76 मंजिल पर मस्जिद बनाई हुई है।


6#. बुर्ज खलीफा के भीतर 58 लिफ्ट है और 2957 गाड़ियों के पार्किंग की जगह भी उपलब्ध है इसके साथ इसमें 304 होटल और लगभग 900 अपार्टमेंट है।


7#. बुर्ज खलीफा को पहले बुर्ज दुबई कहा जाता था बाद में दुबई के राष्ट्रपति बिन ज़ायेद अल नह्यान के सम्मान में इसका नाम बुर्ज खलीफा रख दिया गया।


8#. बुर्ज खलीफा के निर्माण में 1,10,000 टन से ज्याद कंक्रीट, 55,000 टन से ज्यादा स्टील रेबर लगा है।


9#. इस इमारत की ऊंचाई इतनी है कि इस 16 किलोमीटर दूर से देखा जा सकता है।


10# इस इमारत की ऊंचाई इतनी है कि इसके सबसे ऊपरी मंजिल पर सबसे निचले मंजिल के मुकाबले 10 डिग्री सेल्सियस तापमान अधिक रहता है।



11#. इस इमारत की लिफ्ट 65 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चलती है और इमारत के 124वें तल पर स्थित अवलोकन डेक ‘एट द टॉप’ तक मात्र दो मिनट में पहुंच जाती है ।


12#. इमारत के 76वें तल पर दुनिया का सबसे ऊंचा स्वीमिंग पूल और 158वें मंजिल पर स्थित है।


13#. खलीफा में जमीन से 210 मीटर की ऊचाई पर 25 मीटर की चौड़ाई का हेलिपैड भी बनाया गया है जिस पर हेलीकाप्टर उतारा जाता है ।


14#. बुर्ज खलीफा के मालिक Emaar ने इसका प्रस्ताव 2003 में रखा था जिसका काम 2004 में शुरू कर दिया गया था।


15#. बुर्ज खलीफा में एक साथ 35000 लोगों को रहने की व्यवस्था है ।


16#. बुर्ज खलीफा चारों तरफ से एक कृतिम झील से गिरा हुआ है जो इसकी खूबसूरती में और चार चांद लगा देता है।


17#. फ्रांस के दो जंपर ने बुर्ज खलीफा के ऊपर से छलांग लगाने का रिकॉर्ड अपने नाम करा है।


18#. बुर्ज खलीफा को साउथ कोरिया की सैमसंग इंजीनियरिंग कंस्ट्रक्शन ने बनाया जो इससे पहले भी कहीं मशहूर इमारतों के लिए काम कर चुकी है।


19#. बुर्ज खलीफा का स्ट्रक्चर यानी इसकी संरचना एंड स्मिथ नाम के व्यक्ति ने तैयार करी थी।


20#. भारत के राज्य केरला के george v nereparambil  जिन्होंने बुर्ज खलीफा में फ्लैट खरीद रखे हैं।


21#. आपको जानकारी हेरनी होगी  वेबसाइट www.burjkhalifa.ae के मुताबिक, टॉवर के लिए जल आपूर्ति विभाग दिन भर में औतसन 9,46,000 लीटर पानी की आपूर्ति करता है ।


तो यही थी वो कुछ Interesting और Amazing Facts About Burj Khalifa, के बारेमे ।


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The Unsolved Mestry of Titanic in Hindi

October 30, 2021 0 Comments

The  Unsolved Mestry of Titanic in Hindi.


RMS टाइटैनिक दुनिया का सबसे बड़ा वाष्प आधारित यात्री जहाज था। वह साउथम्पटन (इंग्लैंड) से अपनी प्रथम यात्रा पर, 10 अप्रैल 1912 को रवाना हुआ। चार दिन की यात्रा के बाद, 14 अप्रैल 1912 को वह एक हिमशिला से टकरा कर डूब गया जिसमें 1,517 लोगों की मृत्यु हुई जो इतिहास की सबसे बड़ी शांतिकाल समुद्री आपदाओं में से एक है।



10 अप्रैल 1912 इंग्लैंड के सौथामपटों (southampton) बंदरगाह से न्यूयॉर्क के लिए उसवक़्त का ऐक सबसे बड़ा और आलिशान जहाज अपने पहले सफर पर निकला जिसका नाम था आरएमएस टाइटैनिक ईसे देखकर कोई भी नहीं सोच सकता था की ये इसका पहला और आखिरी सफर होगा आज हम इसी के बारे मे बात करने वाले है...की ऐक येसा जहाज जिसे The unsicabal कहा जाता था आखिर उसके डूबने का क्या कारण था तो चलिये जानते हैं।टाइटैनिक जहाज़ के इतिहास के बारे में।


News Hedline.। 


4 दिन यात्रा के बाद यानि 14 अप्रैल 1912 की रात 11 बजकर 40 मिनट पर ये घोषणा हुई कि टाइटैनिक एक भीषण हादसे का शिकार हो गया है और इस घोषणा के के करीब 3 घंटे बाद 15 अप्रैल की सुबह 2:20 पर ये जहाज अटलांटिक महासागर के ठन्डे और बर्फीले सतह के निचे पूरी तरह से गायब हो गया और टाइटैनिक जहाज़ अकेला ही नहीं डूबा बल्कि अपने साथ 1500 से भी ज्यादा ज़िंदगी को ले डूबा

हादसे का कारण टाइटैनिक का एक बड़े हिमखंड से टक्कर होना बताया गया जिसके बाद इस जहाज़ में एक बड़ा छेद हो गया जिस कारण टाइटैनिक जहाज़ में पानी भर गया और वो डूब गया


The Mystery of Titanic in Hindi । The Unsinkable Ship Story in hindi।


लेकिन आपको जानकार हैरानी होगी की जब टाइटैनिक का निर्माण किया गया था तो ये दावा किया गया था की ये एक अनसिंकेबल शिप यानि कभी का टूटने वाला जहाज़ है टाइटैनिक उस समय सबसे अनुभवी इंजीनयरों द्वारा बनाया गया था और इसके निर्माण में उस समय की सबसे उन्नत और प्रभावी तकनीक का इस्तेमाल किया गया था तो अपने पहले ही सफर में टाइटैनिक के हिमखंड से टूटने की बात में कितनी सच्चाई है चलिये जानते हैं।

शोधकर्ताओ की बात को देखा जाये तो वो सभी आजतक टाइटैनिक जहाज के डूबने की बात को आजतक नकारते आये है, 46000 टन वजन, 882 फ़ीट लम्बाई, 92 फ़ीट चोराई और 175 फ़ीट उचाई वाला टाइटैनिक अपने समय का सबसे विशाल समुद्री जहाज़ था इसकी विशालता का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते है की 882 फीट लंबाई वाले जहाज़ को अगर सीधा खड़ा कर दिया जाये तो यह अपने समय की हर इमारत से ऊंचा होता।

निर्माण और बनावट :-


आकार में ये जहाज़ 3 फुटबॉल मैदान से भी बड़ा हुआ करता था 20 मंज़िल उचाई जितने ऊंचे टाइटैनिक जहाज़ का निर्माण बहुत ही जोखिम भरा था इसके निर्माण के दौरान 8 मजदूर गिरकर मारे गए जबकि 246 मजदूर घायल हो गए
टाइटैनिक जहाज़ को बनाने का काम 31 मार्च 1909 में 3000 लोगो की टीम द्वारा शुरू किया गया और सिर्फ 26 महीनो यानि 31 मार्च 1911 तक इसे पूरा बना दिया गया लेकिन इसकी चिमनिया लगाने और डेकोरेशन का काम 1912 तक चलता रहा
उस समय टाइटैनिक के निर्माण की लागत 7.5 मिलियन डॉलर आयी थी लेकिन आज की मुद्रा स्तिथी के हिसाब से इस विशालकाय जहाज को बनाने की लागत 400 बिलियन डॉलर यानि की 26000 करोड़ रूपए के आसपास आती है इतनी बड़ी लागत और उस समय की सबसे बेहतरीन तकनीक और सबसे बेस्ट मटेरियल से बने टाइटैनिक का महज़ एक बर्फीली चट्टान से टकराकर 2 टुकड़ों में टूट जाना सच में एक अविश्वनीय घटना है और इसी सच्चाई से पर्दा हटाने के लिए शोधकर्ताओ ने कई विशेष कारणों से पर्दा हटाया है।

वे सारे नाम जो टाइटैनिक बनाने में शामिल हुए :-

टाइटैनिक के डिजाइनरों में Lord Pirrie का नाम प्रमुख है. वह Harland & Wolff और White Star के संचालक थे. नौसेना आर्किटेक्ट Thomas Andrews इसी कंपनी में निर्माण प्रबंधक और डिजाइन विभाग के प्रमुख थे. फिर नाम आता है Alexander Carlisle का जो कि शिपयार्ड के प्रमुख रचनाकार और जनरल मैनेजर थे. Alexander Carlisle की ही जिम्मेदारी थी कि वह जहाज में विलासिता से भरी साज-सज्जा कराएं, जरूरी उपकरण, व्यवस्था और Lifeboat रखें. 

टाइटैनिक का निर्माण :-


टाइटैनिक का निर्माण 31 मार्च 1909 को American J.P. Morgan और International Mercantile Marine Co. की लागत से शुरू हुआ. 
इसके पतवारों को 31 मई 1911 को जल में उतारा गया और तैयारी होने लगी कि अगले साल इसकी यात्रा शुरू कर दी जाए. 
टाइटैनिक की कुल लम्बाई 882 फीट और 9 इंच (269.1 मीटर), इसके ढालों की चौड़ाई 92 फीट (28.0 मीटर), भार 46,328 टन (GRT) और पानी के स्तर से डेक तक की ऊंचाई 59 फीट (18 मीटर) थी. जहाज में दो पारस्परिक जुड़े हुए चार सिलेंडर, triple-expansion steam engines और एक कम दबाव Parsons turbine (जो प्रोपेलर को घुमाते थे) था. 
इसमें 29 boiler थे जो 159 कोयला संचालित भट्टियो से जुड़े हुए थे और जहाज को 23 समुद्री मील (43 km/h, 26 mph) की तेज गति प्रदान करते थे. 62 फीट (19 मी) की उचाई की चार में से केवल तीन funnel काम करती थीं और चौथी funnel, वेंटिलेशन के लिए थी. इसके साथ ही यह जहाज को अधिक सजावटी और आकर्षक भी बनाती थीं. जहाज की कुल क्षमता यात्रियों और चालक दल के साथ 3549 थी.

The Mystary of Titanic :-


जब टाइटैनिक अपने पहले और आखिरी सफर पर निकला था उसी समय एक पत्रकार ने एक फोटो ली थी जिसे देखकर साफ़ साफ़ पता चलता है कि जहाज़ के नीचे एक काला निशान था हलाकि की उस समय इस बात पर ध्यान नहीं दिया गया लेकिन हादसे के बाद जब शोधकर्ताओ ने खोजबीन शुरू की तो पता चला कि टाइटैनिक के रवाना होने से पहले ही टाइटैनिक में रखे कोयले में आग लग गई थी।

कमाल की बात ये है की ये आग लगभग 3 हफ्ते से जल रही थी और इसपर किसी की नजर ही नहीं गयी और इतना तो हम सभी जानते है कि लोहा गर्म होने पर लाल और कमजोर हो जाता है आग की वजह से जहाज के निचे की तरफ का काला हिस्सा लाल हो चूका था जैसा की आप निचे दी गयी फोटो में देख सकते है

और दुर्भाग्यवश जहाज़ भी हिमखंड के ठीक उसी हिस्से में जा टकराया जो आग में जलकर कमजोर हो चुका था अगर समय रहते उस आग पर ध्यान दिया गया होता तो शायद टाइटैनिक के उस हिस्से में हिमखंड के टक्कर से छेद नहीं होता बल्कि सिर्फ एक बड़ा झटका लगकर ही रह जाता और शायद टाइटैनिक कभी नहीं डूबता
बताया जाता है कि टाइटैनिक को चलने के लिए प्रतिदिन 600 टन कोयले की आवश्यकता पड़ती थी दरअसल उस समय कोयला की खदानों में हड़ताल चल रही थी इसलिए जहाज़ में कोयले की आपूर्ति मुश्किल हो गयी थी

देखा जाये तो जहाज़ की सारी टिकटें पहले ही बुक हो चुकी थी ऐसे में जहाज़ के मालिकों ने जहा से संभव हो सके कोयला खरीदा और दूसरे जहाजों की यात्राये रद्द करवाकर भी उनमें मौजूद कोयले को भी महंगे दामों में खरीद लिया और इसी वजह से दूसरी जहाज़ के यात्रियों को भी टाइटैनिक में शिफ्ट कर दिया गया लेकिन ये उन्हें कहा पता था की ये उनका आखिरी सफर होने वाला है। 


टाइटैनिक की भव्यता और लोकप्रियता का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते है की इसकी पहली यात्रा को देखने के लिए लगभग 1 लाख से भी ज्यादा लोग आये थे।

 
टाइटैनिक का इंटीरियर लंदन के गेट होटल पर आधारित था स्विमिंग पूल और जिम से लेकर टेनिस कोर्ट और म्यूजिक से जुडी सारी सुविधाओ से जुड़ा ये जहाज़ किसी तैरते हुए महल से कम नहीं था टाइटैनिक पर यात्रियों के लिए 20000 बियर और शराब की बोतले 80000 महँगे सिगार और तरह तरह के खाने की वयवस्था थी।


Miths & Mystris :-



टाइटैनिक के डूबने के पीछे का मिथ्स। ऐक कारण यह भी बताया जाता हैं।
टाइटैनिक के डूबने के पीछे दूरबीन की कमी को भी बताया गया दरअसल उन दिनों सोनार सिस्टम नहीं आया था सोनार सिस्टम में एक प्रकार की ध्वनि तरंगे लगातार छोड़ी जाती है और जब वो तरंगे किसी वस्तु से टकराकर वापस आती है तो ये सिस्टम उस वस्तु की आकार और दूरी का सही पता कुछ किलोमीटर की दूरी से ही कर लेता है
उस समय किसी मनुष्य के द्वारा ही दूरबीन की सहायता से समुद्री जहाज़ों के सामने पड़ने वाले रुकावटो पर नजर रखी जाती थी लेकिन एक दुर्भाग्यपूर्ण बात ये भी रही कि जिस कर्मचारी द्वारा दूरबीन से नजर रखी जाती थी उसे जहाज़ के रवाना होने से कुछ मिनटों पहले नौकरी से निकाल दिया गया था। 
और गलती से उस दूरबीन के लॉकर की चाबी उस कर्मचारी के पास रह गयी थी और इसीलिए नए कर्मचारी को दूरबीन नहीं मिल पाया और उसे जहाज़ के सामने आने वाली रुकावटों को अपनी नंगी आंखो से देखना पड़ा। 


यही कारण था की उसको वो हिमखंड तब नजर आया जब जहाज़ हिमखंड से महज़ 100-200 मीटर की दूरी पर ही रह गया था अगर शायद उस कर्मचारी को दूरबीन मिल गयी होती तो वो उस हिमखंड को कुछ किलोमीटर पहले ही देख सकता था तो शायद टाइटैनिक को इस दुर्घटना से बचाया जा सकता था।

हिमखंड से टकराने की कहानी :-


दरअसल अटलांटिक महासागर में ऐसे हिमखण्ड तैरते रहते है इस जहाज़ के कप्तान एडवर्ड स्मिथ को जहाज़ के रास्ते में 6 बड़े हिमखंड की चेतावनी पहले ही दे गयी थी और उनको जहाज़ के धीरे चलने के निर्देश भी दिए गए थे लेकिन शायद एडवर्ड टाइटैनिक की प्रतिस्ठा में एक और रिकॉर्ड जोड़ना चाहते थे कि टाइटैनिक को सबसे विशालकाय और सबसे तेज़ जहाज़ होने का भी दर्जा दिलवाना चाहते थे इसलिए वह हर हाल में न्यू यॉर्क जल्दी पहुंचना चाहते थे।

अगर जहाज़ की स्पीड थोड़ी कम होती तो शायद हिमखंड से टकराने के बाद जहाज़ को काबू में लाया जा सकता था पर गति ज्यादा होने के कारण जहाज़ को जल्दी मोड़ा न जा सका और जहाज़ तेजी से हिमखंड से जा टकराया
टाइटैनिक पर एक साथ 3547 लोग सफर कर सकते थे जिसमे 2687 यात्री हो सकते थे बाकि 860 जहाज़ में काम करने वाले लोग होते थे लेकिन इसकी पहली यात्रा के दौरान इसपर करीब 2228 लोग ही सफर कर रहे थे टाइटैनिक में यात्रियों की संख्या के हिसाब से लगभग 60 आपात्कालीन नाव होनी चाहिए थी लेकिन टाइटैनिक के डिजाइनर ने इससे 48 आपात्कालीन नाओ के साथ ही तैयार करने की योजना बनायीं और बाद में नावों की संख्या केवल 20 करदी थी। 


आपातकालीन नाओ को घटने की डिजाइनर से जब वजह पूछी गयी तो उन्होंने बताया कि इतनी सारी नाओ को लटकाने से टाइटैनिक की सुंदरता खराब हो रही थी और वैसे भी ये कभी न डूबने वाला जहाज़ है
अगर इसकी सुंदरता को ध्यान में न रखकर जरुरत के हिसाब से इसमें आपात्कालीन नाओ लगाया गया होता तो शायद हादसे के बाद भी आपातकालीन नाओ के जरिये सभी लोगो को सुरक्षित बचाया जा सकता था
हिमखंड से टकराने के बाद जब टाइटैनिक में छेद हुआ तो जहाज़ के कप्तान को यकीन नहीं हो रहा था की ये जहाज़ डूब जायेगा और इसीलिए पहली आपातकालीन बोट को रवाना करने में लगभग 1:30 घंटे का समय लगा दिया गया

और अजीब बात तो ये थी की इस आपातकालीन नाओ में 65 लोगो के बैठने जगह थी और केवल इसमें 27 लोग ही सवार थे क्यूंकि ये किसी को विश्वास नहीं हो रहा था कि टाइटैनिक डूब जायेगा
इतना सब कुछ होने के बावजूद भी टाइटैनिक के यात्रियों को आसानी से बचाया जा सकता था लकिन यह एक और सबसे बड़ी गलती की गयी वो ये थी की जब जहाज़ में पानी भरने लगा तो जहाज़ के कप्तान ने तब भी जहाज़ को धीमी गति से चलाना सही समझा क्युकी टाइटैनिक के हादसे की खबर सुनते ही एक दूसरे जहाज़ को मदद के लिए रवाना कर दिया गया था जोकि टाइटैनिक से महज़ 4 घंटे की दूरी पर ही था
लेकिन टाइटैनिक को दूसरे जहाज़ की तरफ धीमी गति से भी चलाना महंगा पड़ गया क्युकी जहाज़ के आगे बढ़ने से जहाज़ पानी के दवाब से और ज्यादा टकराने लगा और पानी बहुत तेजी से अंदर की तरफ घुसने लगा लेकिन जबतक कप्तान को इस गलती का एहसास हुआ तबतक अगले हिस्से में इतना पानी भर चुका था कि जहाज़ का अगला हिस्सा पानी में डूबने लगा था। 


ऐसे में सभी यात्री जहाज़ के पीछे के हिस्से की तरफ दौड़ने लगे और इसके बाद जहाज़ का आगे का हिस्सा समुन्द्र में और ज्यादा धसने लगा और जहाज़ कुछ समय के लिए बिच से खड़ा होकर बिच से टूट गया लेकिन टूटने के बाद जहाज़ का ये हिस्सा अलग नहीं हुआ अगर हो जाता तो पिछले हिस्से वाले यात्रियों को अपनी जान बचाने का थोड़ा समय और मिल जाता।
लेकिन जहाज़ का पिछला हिस्सा भी अगले हिस्से की तरह समुन्द्र में डूब गया और इसी के साथ जहाज़ की सारी ज़िंदगिया भी डूब गयी।

बताया जाता है कि टाइटैनिक अटलांटिक महासागर के जिस हिस्से में डूबा वह पानी का तापमान माइनस -2 डिग्री था जिसमे एक साधारण इंसान का 20 मिनट से ज्यादा जिंदा रहना नामुमकिन है यही कारण है की लाइफ जैकेट पहनने के बाद भी कोई यात्री ज्यादा समय तक ज़िंदा नहीं रह पाया। 


मरने वालों में ज्यादातर मर्द थे क्युकी महिलाओ को पहले ही जहाज़ से दूर भेज दिया गया था तो दोस्तों ये थी अटलांटिक महासागर में डूबे टाइटैनिक जहाज़ की असली घटना जिसका अंदाजा आप खुद लगा सकते है।
टाइटैनिक के साथ हुई इस भायक दुर्घटना के लिए आपके क्या विचार है या इस आर्टिकल में कुछ गलतियां है तो हमें कमेंट करके जरूर बताये।

जिस चट्टान से जहाज टकराया :-


जहाज अपनी यात्रा के चौथे दिन तेज गति में चलते हुए एक आइसबर्ग से टकरा गया था. एक अनुमान के मुताबिक यह बर्फीली चट्टान करीब 10,000 साल पहले ग्रीनलैंड से अलग हुई थी।


Titanic

टाइटैनिक के साथ जो कुछ भी हुआ उसके पीछे सबसे बड़ा हाथ विलासिता और अतिमहत्वकांक्षा का था. महत्वकांक्षा थी इतिहास बनाने की, इस बात की कि समुद्र में सबसे बड़ा जहाज पहली बार सबसे तेज गति से तैरा. लेकिन इतिहास इस बात पर बना कि सबसे बड़े जहाज का पहला ही सफर आखिरी हो गया.

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Thursday, October 28, 2021

Origine of life in hindi. पृथ्वी पर जीवन की शुरुवात कैसे और कहां से हुई ?

October 28, 2021 0 Comments

पृथ्वी पर जीवन की शुरुवात कैसे और कहां से हुई ?


पृथ्वी पर जीवन की शुरुवात कैसे और कहां से हुई ? ये ऐ क ऐसा सवाल है जिसका जवाब आज भी वैद्या निको के पास नही आज तक कोई भी पूरे प्रमाण के साथ ये नही बता पाया की जीवन की शुरूवात असल मे कैसे हुई। ई सिलिये इस सवाल का जवाब ढूंढने मे कै लोगोने अपनी पूरी जिंदगी लगा दी ई स सवाल का जवाब ढुंढ़ने मे। और उन्होंने अपने अपने शोध से और प्रमाण से कै सिधांत लोगो के सामने रखे। तर्क वि तर्क रखे। तो आज हम जानेंगे की जीवन की शुरूवात कैसे और कहा से हुई। तो चलिये शुरू करते है।

जैसा की आप सब जानते है की सब जीवों की विशेषता यह है कि वे प्रजनन कर सकते हैं यानी अपनी प्रजाति की संख्या बढ़ा सकते हैं। इसका कारण यह है कि जीवों के शरीर ऐसे पदार्थ से बने होते हैं जिनमें अपने आसपास से पोषण ले कर अपने शरीर में वृद्धि करने की और फिर इस शरीर से अपने समान अन्य जीव बनाने की क्षमता होती है। प्रश्न यह है कि पृथ्वी पर ऐसा पदार्थ सबसे पहले बना कैसे? दूसरे शब्दों में, पृथ्वी पर जीवन की शुरुआत कैसे हुई?
इस प्रश्न का उत्तर खोजने के लिए कई वैज्ञानिक वर्षों से जुटे हुए हैं। रसायन शास्त्री अरेनियस ने यह सुझाव दिया था कि जीवन की शुरुआत किसी अन्य ग्रह पर हुई थी और फिर वहां से जीव बीजाणुओं यानी स्पोर्स के रूप में पृथ्वी पर आए। किंतु यह जीवन की उत्पत्ति की नहीं बल्कि इस बात की व्याख्या है कि जीव कैसे फैले।




उन्नीसवीं शताब्दी तक कई लोग यह सोचते थे कि निर्जीव पदार्थों से जीव अपने आप पैदा हो जाते हैं; जैसे गोबर से इल्लियां या कीचड़ से मेंढक बन जाते हैं। किंतु फ्रांस के वैज्ञानिक लुई पाश्चर ने दिखा दिया कि यह संभव नहीं है। केवल एक जीव से ही दूसरा जीव पैदा हो सकता है। 1871 में अंग्रेज़ वैज्ञानिक चार्ल्स डार्विन ने सुझाव दिया कि जीवन की शुरुआत संभवत: गुनगुने पानी से भरे एक ऐसे उथले पोखर में हुई होगी जिसमें ‘सब प्रकार के अमोनिया और फॉस्फोरिक लवण होंगे जिन पर प्रकाश, ऊष्मा और विद्युत की क्रिया होती रही होगी।’ इससे एक प्रोटीनयुक्त यौगिक बना होगा जिसमें और परिवर्तन हो कर पहले जीव बने होंगे।

अलेक्ज़ेंडर ओपारिन (1924)


अलेक्ज़ेंडर ओपारिन (1924)

1924 में रूसी वैज्ञानिक अलेक्ज़ेंडर ओपारिन ने यह तर्क दिया कि वातावरण में स्थित ऑक्सीजन कार्बनिक अणुओं के संश्लेषण को रोकती हैं और जीवन की उत्पत्ति के लिए कार्बनिक अणुओं का बनना अनिवार्य है। किसी ऑक्सीजन-रहित वातावरण में सूर्य के प्रकाश की क्रिया से कार्बनिक अणुओं का एक ‘आदिम शोरबा’ (प्राइमीवल सूप) बन सकता है। इनसे किसी जटिल विधि से संलयन (फ्यूजन) हो कर नन्ही बूंदें बनी होंगी जिनकी और अधिक संलयन से वृद्धि हो कर ये विभाजन के द्वारा अपने समान अन्य जीव बना सकती होंगी। लगभग इसी समय अंग्रेज़ वैज्ञानिक जे.बी.एस. हाल्डेन ने भी इसी से मिलता-जुलता सुझाव दिया। उनकी परिकल्पना के अनुसार उस समय पृथ्वी पर स्थित समुद्र आज के समुद्रों की तुलना में बहुत भिन्न रहे होंेगे और इनमें एक ‘गरम पतला शोरबा’ बना होगा जिसमें ऐसे कार्बनिक यौगिक बने होंगे जिनसे जीवन की इकाइयां बनती हैं।
1953 में स्टेनली मिलर नामक विद्यार्थी ने अपने प्रोफेसर यूरी के साथ मिल कर एक प्रयोग किया जिसमें उन्होंने मीथेन, अमोनिया और हाइड्रोजन के मिश्रण में अमीनो अम्लों का निर्माण करवाने में सफलता पाई। इससे ओपारिन के सिद्धांत की पुष्टि हुई। आज इस सिद्धांत को लगभग सभी वैज्ञानिकों के द्वारा मान्य किया जाता है। फिर भी, समय-समय पर नए-नए सिद्धांत प्रस्तुत किए जाते हैं। अलबत्ता, कुछ बातों पर आम सहमति है, जैसे:



1. पृथ्वी पर जीवन की शुरूआत लगभग 4 अरब वर्ष पहले हुई थी।
2. उस समय के समुद्रों के पानी का संघटन आज के समुद्रों के पानी से बहुत भिन्न था।
3. शुरुआत में पृथ्वी के वातावरण में ऑक्सीजन नहीं थी, धीरे-धीरे ऑक्सीजन बनती गई और अंतत: वह वर्तमान स्तर तक पहुंची। ऑक्सीजन बनाने का काम हरे पौधे करते हैं जो प्रकाश संश्लेषण के दौरान वातावरण से कार्बन डाईऑक्साइड ले कर ऑक्सीजन छोड़ते हैं। पृथ्वी पर सबसे पहले विकसित होने वाले हरे पौधे सायनोबैक्टीरिया नामक हरे शैवाल थे। अत: यह अनुमान लगाया जा सकता है कि सबसे पहले बनने वाले जीव ऑक्सीजन की सहायता से श्वसन नहीं करते थे, अपितु अनॉक्सी श्वसन से काम चलाते थे। आजकल के अधिकांश जीवों को ऑक्सीजन की आवश्यकता पड़ती है।

चार्ल्स डार्विन (1871)


चार्ल्स डार्विन (1871)

इस विषय में सबसे पहले अपने विचार चार्ल्स डार्विन ने 1871 में दोस्त को लिखी चिट्ठी में व्यक्त किया।
उनके अनुसार पृथ्वी पर सबसे पहले जीवन किसी गर्म तालाब में शुरू हुआ होगा।
डार्विन के अनुसार, गर्म तालाब में मौजूद तरह तरह के केमिकल मॉलिक्यूल और सूर्य की किरणें जीवन के उद्भव का कारण हो सकती है।
1952 में अमेरिकन वैज्ञानिक स्टैंली मिलर (stanley miller) और उनके असिस्टेंट हैरोल्ड यूरी (harold urey) ने एक प्रयोग किया।
जिसमें उन्होंने एक फ्लास्क में पानी और दूसरी फ्लास्क में अमोनिया, हाइड्रोजन और मीथेन जैसे गैस को लिया।
यहां उन्होंने वाटर वाले फ्लास्क को समुद्र की तरह दर्शाया और गैस वाले फ्लास्क को reducing atmosphere की तरह दिखाया।
गैस वाले फ्लास्क में उन्होंने एक इलेक्ट्रोड भी लगाया।
वाटर वाले फ्लास्क से पानी भाप बनकर गैस वाले फ्लास्क में गया।
और इलेक्ट्रोड के स्पार्क की वजह से फ्लास्क से यह पानी गैस के मॉलिक्यूल से रिएक्शन करने लगे।
मिलर और यूरि है यह क्रिया हफ्ते भर तक किया।
और उन्हें यह नतीजा मिला कि यह क्रिया ऑर्गेनिक कंपाउंड और अमीनो एसिड को बनाया, जो प्रोटीन को बनाता है।
और यही प्रोटीन जीवन के लिए बिल्डिंग ब्लॉक होता है।
यूरी और मिलर का यह एक्सपेरिमेंट डार्विन के पृथ्वी पर जीवन (origin of life in hindi) के उद्भव वाले विचारधारा को सही साबित कर रहा था।

पृथ्वी पर शुरुआती कार्बनिक अणुओं के निर्माण के पीछे निम्नानुसार तीन प्रकार की शक्तियां काम कर रही होंगी:

  • 1. अकार्बनिक पदार्थों से कार्बनिक पदार्थों का निर्माण पराबैंगनी किरणों या आसमानी बिजली की चिंगारियों से            संभव हुआ होगा।
  • 2. अंतरिक्ष से आने वाले उल्का पिण्डों के साथ जीवाणुओं का आना।
  • 3. उल्का पिण्डों के लगातार गिरने से होने वाले धमाकों की ऊर्जा से कार्बनिक पदार्थों का संश्लेषण।

प्रोफेसर माइकल रसल



जीवन की उत्पत्ति के बारे में सबसे ताज़ा सिद्धांत अमेरिका की जेट प्रोपल्शन प्रयोगशला से आया है। यहां कार्यरत प्रोफेसर माइकल रसल का तर्क है कि जीवन की शुरुआत समुद्र की गहराइयों में स्थित गरम पानी के फव्वारों में हुई। किस्सा यह है कि 1977 में प्रशांत महासागर में कार्यरत एक तैरती प्रयोगशाला ने पाया कि बहुत गहरे समुद्र के तल में दरारें हैं। इन दरारों में से निकलने वाले पानी का तापमान 4000 डिग्री सेल्सियस होता है। इन दरारों को ऊष्णजलीय दरारें (हाइड्रोथर्मल वेन्ट्स) कहते हैं। पृथ्वी का तल कई प्लेटों से मिल कर बना है। ये प्लेटें खिसकती और एक-दूसरे से टकराती रहती हैं। जब दो प्लेटें टकराती हैं तब पृथ्वी की सतह हिलती है यानी भूकंप होता है। किंतु समुद्र की गहराइयों में दो प्लेटों के बीच स्थित ऊष्णजलीय दरारों में से रिस कर समुद्र का पानी अंदर जाता है। यहां उसका सामना पृथ्वी की गहराइयों में स्थित पिघली हुई चट्टानों (मैग्मा) से होता है। इनके मिलने से पानी का तापमान 4000 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है किंतु वह उस गहराई में स्थित विशाल दाब के कारण भाप नहीं बन पाता और ऊपर की ओर उठता है। जब यह बहुत अधिक गरम और क्षारीय पानी बाहर आ कर गहरे समुद्र में स्थित बहुत अधिक ठंडे पानी से मिलता है तब कई खनिज पदार्थ अवक्षेपित हो जाते हैं और एक के ऊपर एक जमा हो कर मीनार के समान रचना बनाते हैं; समुद्र के पेंदे में इस प्रकार की सैकड़ों फीट ऊंची मीनारें बनी हुई हैं। सन 2000 में अटलांटिक महासागर के पेंदे पर ऐसी मीनारों का एक पूरे शहर के समान जमावड़ा पाया गया। जब इन मीनारों का और अधिक विस्तार से अध्ययन किया गया तब प्रोफेसर रसल को उनके सिद्धांत का आधार मिल गया। होता यह है कि खनिज पदार्थों की मीनारों में स्पंज के समान छिद्र होते हैं। इन छिद्रों में होने वाली रासायनिक क्रियाओं के कारण ऊर्जा बनने लगती है। प्रोफेसर रसल के अनुसार इन छिद्रों में स्थित अकार्बनिक पदार्थों में इस ऊर्जा के कारण कई प्रकार की रासायनिक क्रियाएं होने लगीं और इनसे पहला जीवित पदार्थ बना। इस जीवित पदार्थ के लिए ऊर्जा का स्रोत छिद्रों में ही उपलब्ध होने के कारण उनमें वृद्धि और प्रजनन होने लगे। आज भी समुद्र के पेंदे पर स्थित गरम पानी की इन मीनारों में ऐसे जीव पाए जाते हैं जो पृथ्वी की सतह पर और कहीं नहीं मिलते।


सवाल यह उठा कि इस सिद्धांत का प्रमाण कैसे जुटाया जाए? तब प्रोफेसर रसल और उनकी टीम ने अपनी प्रयोगशाला में एक अनोखा प्रयोग शु डिग्री किया। उनकी प्रयोगशाला में ये शोधकर्ता उस क्षण को दोहराने की कोशिश कर रहे हैं जो जीवन के शु डिग्री होने से पहले का क्षण था। समुद्र के पानी से भरे कांच के कई बर्तनों के तलों में लगाई गई सिरिंजेस के द्वारा रसायनों का ऐसा मिश्रण छोड़ा जा रहा है जिसका संघटन लगभग उस क्षारीय द्रव के समान है जो ऊष्णजलीय दरारों से निकलता है। जब ये दोनों द्रव मिलते हैं तब खनिज पदार्थ अवक्षेपित हो जाते हैं और मीनार के समान एक रचना बनाते हैं। प्रोफेसर रसल को ये मीनारें उनकी परिकल्पना के परीक्षण करने का अवसर दे रही हैं। उनका कहना है कि केवल कार्बनिक अणुओं का बनना जीवन के निर्माण का आधार नहीं हो सकता। इन अणुओं का केवल बनना पर्याप्त नहीं है, उनके लिए ऊर्जा के एक स्रोत की भी आवश्यकता होती है और प्रोफेसर रसल सोचते हैं कि इस प्रकार की ऊर्जा ऊष्णजलीय दरारों पर बनी खनिजों की मीनारों से ही प्राप्त हो सकती है।
अगर यह प्रमाणित हो भी जाए कि प्रोफेसर रसल की परिकल्पना सही है, फिर भी यह संभव है कि जीवन की उत्पत्ति विविध परिस्थितियों में और विविध कारणों से हुई हो। यह भी संभव है कि यहां जिन परिकल्पनाओं का विवरण दिया गया है, उनके अतिरिक्त और भी परिकल्पनाएं भविष्य में प्रस्तुत की जाएं।


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Sunday, October 24, 2021

Amazon rainforest in hindi. Amazon ka jungle

October 24, 2021 0 Comments

Amazon Ka Jungle

Amazon rainforest in Hindi

5 most dangerous animals in the Amazon rainforest

अगर हम पृथ्वी की बात करें तो अमेज़न जंगल हमारे पृथ्वी का दिल है मतलब हमारी पृथ्वी का 20% ऑक्सीजन Amazon Rainforest के जंगल से ही produce होता है। आइए जानते हैं अमेज़न जंगल के बारे में कुछ interesting facts. 


अमेज़न जंगल के बारे में बताने से पहले मै आपको बता दूँ कि अमेज़न जंगल एक नहीं बल्कि 9 देशों में फैला हुआ है। इसका सबसे बड़ा भाग Brazil में 60% , Peru में 13% , Colombia में 10% और इसके बाद और भी पांच देशों में फैला हुआ है। क्या आपको पता है Amazon Rainforest के जंगल में लगभग 4 million (4 अरब) से भी ज्यादा बृक्ष है और यह पेड़ इतने बड़े और घने हैं कि यहां की जमीन धूप के लिए भी तरस जाती है। मतलब सूर्य की किरण यहाँ तक पहुंच ही नहीं पाती है यहाँ के पेड़ इतने ज्यादा घने है।

World का 62% Rain Forest  का हिस्सा अकेले Amazon Rainforest के जंगलों से ही आता है। क्या आपको पता है Amazon Rainforest के  जंगल का कुल क्षेत्रफल लगभग 5.6 million square kilometers है। जो कि हमारे भारत देश के कुल क्षेत्रफल से भी ज्यादा है। इससे आप समझ ही सकते हैं कि Amazon Rainforest कितना बड़ा जंगल है। Amazon Rainforest का जंगल पूरी पृथ्वी का लगभग 4% में फैला हुआ है।

आप amazon rainforest के बारे में जानने से पहले आप Amazon River के बारे में भी जान लीजिए । Amazon River दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा नदी है। अगर पानी की स्टोरेज की बात करें तो Amazon River दुनिया का सबसे बड़ा नदी है। और दुनिया का 20% नदी Amazon के River में जाके मिलती है। और बारिस के दिनों  में जब नदी में पूरा पानी भर जाता है तो कहीं कहीं नदी की चौड़ाई इतनी ज्यादा बढ़ जाती हैं कि नदी के इस छोर से उस छोर का पता ही नहीं चलता है। लगता है कि हम कोई Ocean देख  रहे हैं जिसका छोर पता ही नहीं चलता है।

Amazon River

Amazon Forest के जंगल में लगभग 17,000 से भी ज्यादा केवल पेड़ के प्रजाति पाए जाते हैं। यहां पर 30,000 से भी ज्यादा केवल कीड़े की प्रजाति पाई जाती है। और क्या आपको पता है केवल Amazon के River में 5000 से भी ज्यादा मछली की प्रजाति पाई जाती हैं। और आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि जंगल में 3000 से भी ज्यादा मकड़ी (spider) की प्रजाति पाई जाती है। अब हम बात करते हैं Amazon Rainforest के जंगल में पाए जाने वाले 5 most dangerous animals in amazon rainforest

1. Bullet Ant 

Bullet Ant

Bullet Ant एक ऐसी चींटी है जो बहोत ही छोटी होती है। आपने चींटी तो बहुत सारे देखे होंगे लेकिन Bullet Ant जैसी चींटी नहीं देखी होगी। यह देखने में बहुत ही छोटी होती है लेकिन इसका डंक बहुत ही खतरनाक होता है। इस चींटी का काटना किसी गोली के लगने के समान होता है। इसलिए शायद इसे Bullet Ant कहा जाता है। इसके काटने से बहुत असहनीय दर्द होता है जिसे सहन करना बहुत ही ज्यादा मुश्किल होता है। इसलिए से Bullet Ant कहा जाता है। यह Amazon Rainforest के जंगल में बहुत ही ज्यादा मात्रा में पायी जाती है।

2. Boiled Water River 

Boiled water River

Amazon Rainforest के जंगल में एक ऐसी नदी है जिसका टेंपरेचर लगभग 110°C है। जिसमें कहीं कहीं पानी उबलता हुआ अभी दिखाई देता है। यहां का पानी बहुत ज्यादा ही गर्म होता है। यहाँ के कुछ जनजाति लोग अगर किसी जनजाति के वासी की मौत हो जाती है तो उस बॉडी को जलाने और दफनाने के बजाय इस नदी में बॉडी को डाल देते है। कुछ जनजातियों का मानना है इस नदी को स्वर्ग का द्वार भी कहा जाता है।

3. Anaconda

Anaconda

Anaconda साप आपने हॉलीवुड मूवी में बहुत बार देखा होगा। जिसमे एक ही जगह कई बड़े-बड़े सांप जंगलों में घूमते रहते हैं और इंसानों को डायरेक्ट ही निकल जाते हैं। लेकिन असलियत में Amazon Rainforest के जंगल में इतना ज्यादा बड़ा एनाकोंडा नहीं पाया जाता है। Amazon Rainforest के जंगलो में जो एनाकोंडा पाया जाता है उसकी लंबाई लगभग 30 फीट से 40 फीट होती है। जिसका ज़हर तो नहीं होता है लेकिन ये बहुत ही खतरनाक होता है। ये छोटे बड़े जानवरों को निकलते ही खा लेता है और ये  एक बार अगर किसी जानवर  को निगल कर खा ले तो लगभग महीने भर ये बिना खाये भी रह सकता है और यह ज्यादातर दलदली  स्थान या  पानी वाले स्थान में पाया जाता है।

4. Poisonous Frog


Poisonous Frog

Amazon Rainforest के जंगल में लगभग 120 प्रकार के जहरीले मेंढक भी पाए जाते हैं। चटक सुनहरी रंग के ये मेंढक देखने में तो बहुत ही आकर्षक लगते है। लेकिन एक मेंढक में लगभग 10 लोगों को मारने लायक जाहर पाया जाता है। यह कई कलर में पाया जाता है और यह बारिशो के दिनों में सबसे ज्यादा दिखाई देते है। स्थानीय लोग या पर्यटक  यहां जब घूमने जाते हैं तो इस मेंढक को देखते ही बहुत दूर हो जाते हैं। क्योंकि यह मेंढक बहुत ही ज्यादा जहरीला होता है।

5. Eagle

Amazon Rainforest के जॅंगलो में एक eagle पाया जाता है जो बहुत ही खतरनाक और फुर्तीला होता है। इसका साइज इतना बड़ा होता है कि केवल इसके पंख की लंबाई 3 फीट से भी ज्यादा होती हैऔर इसका वजन 5 से 6 किलो तक होता है। ये अपने वजन से दुगना वजन अपने पंजो में पकड़कर उड़ सकता है। जिसके कारण ये अपना फेवरेट शिकार बंदर को बनाता है। लेकिन ये प्रजाति अब धीरे-धीरे लुप्त हो रही है।

तो ये थे वो खुछ मोस्ट देंगेरेस् शिकारी ऐमेझोन रेन फॉरेस्ट के। उम्मीद करते है की आपको हमारी दी गई जानकारी पसंद आई होगी।

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Mystery of bermuda triangle in hindi।

October 24, 2021 0 Comments

Mystery of Bermuda triangle in Hindi


अनसुलझा रहस्यः यहां जाने वाला जहाज वापस लौटकर नहीं आता।

यह संसार रहस्य से भरा पड़ा है। ऐसा ही एक रहस्य है अमेरिका के दक्षिण पूर्वी तट पर बना बरमूडा ट्राएंगल है। यहां भूले से कोई जहाज पहुंच जाए तो पता नहीं चल पाता कि जहाज को आसमान निगल गया या समुद्र खा गया।
वैज्ञानिक भी बरमूडा ट्राएंगल के इस रहस्य का पता नहीं लगा पाएं हैं कि आखिर यहां कौन सी शक्ति है जो जहाज को निगल जाती है।

कहां और कैसा है बरमूडा ट्राएंगल :-


बरमूडा ट्राएंगल अमेरिका के फ्लोरिडा, प्यूर्टोरिको और बरमूडा तीनों को जोड़ने वाला एक ट्रायंगल यानी त्रिकोण है, जहां पहुंचते ही बड़े से बड़ा समुद्री और हवाई जहाज गायब हो जाता है। इस ट्राएंगल के पास पह‌ुंचते ही न तो जहाज मिलता है और न ही उसके यात्री।

जब लापता जहाज का यह राज पता चला

मैरी सेलेस्टी नाम का एक व्यापारिक जहाज बरमूडा ट्राएंगल क्षेत्र में लापता हो गया था। 4 दिसम्बर 1872 को अटलांटिक महासागर में यह पाया गया। इस जहाज पर सवार यात्री और जहाज के कर्मचारी का कोई पता नहीं चला।

शुरू में यह माना गया कि जहाज समुद्री डाकुओं द्वारा लूट लिया गया होगा। लेकिन जहाज पर कीमती सामानों के सुरक्षित होने से डाकुओं द्वारा जहाज को लूट लिए जाने की बात साबित नहीं हो सकी।
फिर से गायब हुआ जहाज


मैरी सेलेस्टी जहाज तरह की 1881 में एलिन ऑस्टिन नाम का जहाज यहां आकर गायब हो गया। एलिन ऑस्टिन नाम का एक जहाज कुशल चालकों के साथ न्यूयार्क के लिए रवाना हुआ।

यह जहाज बरमूडा ट्राएंगल के पास रास्ते में कहीं खो गया। जब यह जहाज मिला तो जहाज पर सवार किसी व्यक्ति का कुछ पता नहीं चला।
रहस्य है इस जहाज का गायब हो जाना


अमेरिका के लेफ्टिनेंट कमांडर जी डब्ल्यू वर्ली 309 क्रू सदस्यों के साथ यूएसएस साइक्लोप्स नाम के जहाज से सफर कर रहे थे। बरमूडा ट्राएंगल को पार करते समय यह जहाज कहां खो गया कुछ पता नहीं चला।

जिस दिन यह घटना हुई थी, उस दिन मौसम भी अनुकूल था। क्रू के सदस्य संदेश भेज रहे थे कि सब कुछ ठीक चल रहा है। लेकिन अचानक मंजर बदल गया और जहाज किस दुनिया में खो गया, कोई जान नहीं पाया।

अमेरिका के इतिहास में इस जहाज का लापता होना और क्रू मेंबर का गायब होना एक बड़ा रहस्य बना हुआ है।

बरमूडा ट्राएंगल में गायब हुए हवाई जहाज

इस क्षेत्र से गुजरने वाले कई हवाई जहाजों का भी कोई अता-पता नहीं है। फ्लाईट 19, स्टार टाईगर, डगलस डीसी-3 बरमूडा ट्राएंगल में गुम होने वाले हवाई जहाजों के नाम हैं।
जहाज गायब होने में एलियन का हाथ

इस क्षेत्र में जहाजों के गायब होने के कारण पर कई शोध और अध्ययन हुए लेकिन कुछ पता नहीं चल पाया। शुरुआती शोध के परिणाम बताते हैं कि बरमूडा ट्राएंगल के पास एक विशेष प्रकार का कोहरा छाया रहता है जिसमें जहाज भटक जाते हैं।

जहाजों के गायब होने का दूसरा कारण यह बताया जाता है कि इस क्षेत्र में मीथेन गैसों का भंडार है। इससे पानी का घनत्व कम हो जाता है और जहाज धीरे-धीरे पानी में समाने लगता है।

अफवाहें तो यह भी हैं कि इस क्षेत्र में एलियन्स का रिसर्च सेंटर है। एलियनों को बाहरी दुनिया के लोगों का इस क्षेत्र में प्रवेश पसंद नहीं है, इसलिए इस तरह की घटनाओं को वह अंजाम देते हैं। जहाज गायब होने के कारण अभी तक खोजे नहीं जा सके हैं।


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